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Showing posts from January, 2018

बुलबुले

पानी के कई अनगिनत से बताशे रोज मेरे खेलों में बनते बिगड़ते है आज फिर खुब चमकता सा एक बुलबुला अनायास हवा में गुम होता चला गया । ऐसे ही बेबाक मेरा हसंना और मेरी चमकती आखों में क्षणिक झिलमिलाते असंख्य जुगनु कई दफा रात में बने और दिन में पता न लगा। रोटी में चांद खोजने की कोशिशें नमक की ढेली में हर बार नये स्वाद लेता जिंदा रखता गया मुझमें मेरा सपना चाहे मैं कई बार कुर्ते की बांहे अनायास भिगा गया । मैं नही जानता खुशियों के बँटवारे सबके लिये अलग अलग कैसे हैं किन्तु मेरी खुशियों के मायने कुछ तो जुदा है उन्हे आसान और मुझे पल पल जलजला मिलता गया गाहेबगाहे आती रही जो चुनौतियों की सदायें परवाह नही कौन मुझसे मेरी राहे जुदा करता गया मैं हसंने के बहाने तलाशता सा बेफिक्र भले ही आज भी वही हूँ एक बनता बिगड़ता बुलबला ।। नीलम पांडेय “नील”

दीवारें

दीवारें बहुत लंबी उम्र लेकर आती है इंसान से भी अधिक  पर एक समय के बाद उनमें पसरी नमी,सीलन से बस वे छुने भर से ही भरभरा जाती हैं जाने कब से रोका हैं सैलाब उसने भीतर उठा नही पाती जब वे बोझ खुद का भी अंदर संर्वांग तक भीगते वे तन्हा होने लगती हैं सदियों तक न पाकर अपने आस पास आदमी की सांसे वो दम तोड़ती रहती हैं आज सुनी मैंने भी उनकी घुलती सांसो  और अंदर से दिखती टुटी धुमिल प्रतीकों की  अनगिनत खामोश बातें उनकी कोशिशें खुद को जिंदा रखने की चौखटों की नक्काशी में छुपी वैभव की कहानी कभी कभी सुनायी देती है दीवारों में हंसी ठहाको की वही पुरानी सी ठसक और एक लंबी सी कसक ।।। नीलम नवीन “नील”

शपथ

शपथ है तुमको मेरे दोस्त मेरे जाने के बाद रस्म की मेरी कोई गुजारिश न होगी बस छोटी सी ख्वाहिश मेरे कफन में तिंरगे की होगी ।       न जलाना न दफनाना मुझे       बस बाँट देना जिस्म को जब       जरूरत हो जिसकी जैसी भी       और जो बचे वो गंगा की होगी । शपथ है तुमको मेरे दोस्त परवाह नही कि चील कौवे मछली का निवाला बन जाऊँ बस तराण आये मनको उनके।           न फुल न अगरू न थूप देना         थोड़ी सी मिट्टी मेरे गाँव की          मेरे माथे पर टिका देना और         गौशाला में चाहो तो घुमा देना शपथ है तुमको मेरे दोस्त न हलुवा न पुरी न खीर हो बस भरपेट रोटी, तरकारी हो पास की बस्ती में उस दिन जश्न हो       चाहो तो वीणा,मृदंग, सितार बजाना       वो पुराने रेडियो में एफ एम चलाना     ...

माँ की तरह

अब मैं जागना चाहती हूँ पर ना जाने क्यों ? मेरी असीमित नींद पल पल मेरा पीछा कर रही है जैसे कुछ छुपाना चाहती है मुझसे अब मैं पूरी रात जागकर सुनना चाहती हूँ रात की सिसकियों को और अपनी कृत्रिम रोशनी से उसके अंधेरे को बाटंना चाहती हूँ पर हर बार वह मुझे सुला कर अकेले ही अपने अँधेरे में जूझ रही है बिल्कुल माँ की तरह । नीलम नवीन "नील"