शपथ


शपथ है तुमको मेरे दोस्त
मेरे जाने के बाद रस्म की
मेरी कोई गुजारिश न होगी
बस छोटी सी ख्वाहिश मेरे
कफन में तिंरगे की होगी ।
      न जलाना न दफनाना मुझे
      बस बाँट देना जिस्म को जब
      जरूरत हो जिसकी जैसी भी
      और जो बचे वो गंगा की होगी ।
शपथ है तुमको मेरे दोस्त
परवाह नही कि चील कौवे
मछली का निवाला बन जाऊँ
बस तराण आये मनको उनके।
 
        न फुल न अगरू न थूप देना
        थोड़ी सी मिट्टी मेरे गाँव की
         मेरे माथे पर टिका देना और
        गौशाला में चाहो तो घुमा देना
शपथ है तुमको मेरे दोस्त
न हलुवा न पुरी न खीर हो
बस भरपेट रोटी, तरकारी हो
पास की बस्ती में उस दिन जश्न हो
      चाहो तो वीणा,मृदंग, सितार बजाना
      वो पुराने रेडियो में एफ एम चलाना
      और बार्डर की खबरों के संग संग
       बस एक गीत शहीदी का बजा देना।
शपथ है तुमको मेरे दोस्त
मेरे जाने के बाद रस्म की
मेरी कोई गुजारिश न होगी
बस छोटी सी ख्वाहिश मेरे
कफन में तिंरगे की होगी ।
नीलम नवीन“नील”
4/1/17

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