नदी, पहाड़ और औरत
ईजा को देखती हूँ बातें करते गाढ़ गधेरों, नदियों से और कभी कभी पहाड़ों से तो महसूस हुआ यकीनन पहाड़ों में औरतें दो तरह की होती हैं एक नदी और दूसरी पहाड़ सी नदी सी औरत बस बहती है संवेदनाओं के सुरों में कभी चंचल, कभी शान्त कभी मुखर भावों में अनजानी राहों में हिम सी पिघलती हुयी छोड़ आती है अपनी ऊँचाई,अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने मन के अबाध सौन्दर्य से खुद को भुल कर सींचने लगती है आदम और उनकी जड़ों को कभी जब छलछला कर उतर जाती है वह जीवन की तलहटी में तब भी नही छोड़ती वह अपनी आत्मा देह में बसी और खोल देती है अन्त:श जीवन भर सबको नम करते करते जाने कब किस मोड़ पर एकाएक समन्दर को सौंप देती है अपना अस्तित्व भी और खो जाती हैं गंगा ,गोमती, मंदाकिनी, शारदा, भागीरथी जैसे कई नाम जो मां और मायके की शीतल हिमनदी सी बयारों में कभी मिले थे उसे और दुसरी पहाड़ सी औरत कठोर होकर समेट लेती है अपनी कोमलता छिपा लेती है सारे भाव वह पुरुष बन जाती है कभी प्रहरी और कभी संबल बन जाती है बस रोना भुल खड़ी रहती है बरसों जीती है कई मंजर पहाड़ से जीवन के जब तक कोई ...