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Showing posts from October, 2017

नदी, पहाड़ और औरत

ईजा को देखती हूँ बातें करते गाढ़ गधेरों, नदियों से और कभी कभी पहाड़ों से तो महसूस हुआ यकीनन पहाड़ों में औरतें दो तरह की होती हैं एक नदी और दूसरी पहाड़ सी नदी सी औरत बस बहती है संवेदनाओं के सुरों में कभी चंचल, कभी शान्त कभी मुखर भावों में अनजानी राहों में हिम सी पिघलती हुयी छोड़  आती है अपनी ऊँचाई,अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने मन के अबाध सौन्दर्य से खुद को भुल कर सींचने लगती है आदम और उनकी जड़ों को कभी जब छलछला कर उतर जाती है वह जीवन की तलहटी में तब भी नही छोड़ती वह अपनी आत्मा देह में बसी और खोल देती है अन्त:श जीवन भर सबको नम करते करते जाने कब किस मोड़ पर एकाएक समन्दर को सौंप देती है अपना अस्तित्व भी और खो जाती हैं गंगा ,गोमती, मंदाकिनी, शारदा, भागीरथी जैसे कई नाम जो मां और मायके की शीतल हिमनदी  सी बयारों में कभी मिले थे उसे और दुसरी पहाड़ सी औरत कठोर होकर समेट लेती है अपनी कोमलता छिपा लेती है सारे भाव वह पुरुष  बन जाती है कभी प्रहरी और कभी संबल बन जाती है बस रोना भुल खड़ी रहती है बरसों जीती है कई मंजर पहाड़ से जीवन के जब तक कोई ...

सुबह जैसी शाम

कुछ नही बस .....यूँ ही खाली अक्षांश में सोयी हुयी नियति मात्र कभी रेतीले रेगिस्तान में चमकते पानी का सा भ्रम । जब सुबह और शाम के फर्क धुंधलाने लगते है तब रंगे हुऐ गगन में अलसाया सा सूरज भी अपनी तपिश में जलता अकसर अकेला रह जाता है । धरा की रोशनी होकर भी वह आने वाली शाम को उनींदी आखों में समेट चाँद के अनचाहे स्पर्श के सपने देखता है । ढलती शाम में चांद जैसा बनने की कोशिश किन्तु सूरज फिर भी नही छोड़ पाता अपनी रक्तिमता कितने अलग चांद और सूरज । एक ही आकाश में दो अजनबी जब खुद आकाश गंगा के रास्ते में चलते हैं तब चटक सुबह और इंद्रधनुषी शाम में पुरी कायनाथ को गुलाबी हो आयी आखों से समेटने लगते हैं । सदियों से ये लुकाछिपी किसी से छुपी नही है पर जब नही देख पाती अधूरे मिलन को तब परियां शाम को धरती पर उतरती हैं । वो बंद होते फुलों  में रात होने तक छुप जाती है तब उसी क्षण शाम बेहद रंगीन होती है ,कुछ पल सुरज और चांद इकठ्ठे आसमान में दिखते है आह ! तब थोड़ी सी सुबह जैसी शाम होती है । नीलम नवीन "नील" 10/10/16

तनश्वर

तनश्वर केवल पुरुषेश्वर या अर्ध नारीश्वर भेद किधर है बताओगे जरा शुक्ष्म जैविक भेद पर तर्क करना, बांट देना एक महाशक्ति पुंज को यूहीं प्रकृति की गति बदल कर विनाश को चरमता में ले आओगे  बोलो ! कैसे सह पाओगे फिर क्यों स्त्री और पुरुष में उलझ कर युग्म की गति को क्षीण कर रहे हो यह जो एक महाकाव्य है युगों युगांतर तक सृष्टि की अंतिम सृष्टि में उसकी रचना ही न भूल जाओगे तुम याद है सदियों रेंग रेंग कर जीव जब तनश्वर बना धरती के विस्तार में स्वयं ही स्वयंभू कभी धरती बना किन्तु आज समंदर की दिशा बदल कर वही फिर से रेंग रेंग कर हिमखण्ड में ही न बदल जाओगे तुम या पिघल कर हवा में तब्दील हो जाओगे तब कहीं सदियों बाद पुनः रूहानी हवाओं के गर्म विस्तार से दो स्वरूपों में आदि अनादि शक्ति मनु और इड़ा जन्म लेंगे तब कोई रंगरेज फिर धरती को हरा रंग देगा और पुरुस्त्री धरती कई  रंगों में रंग जायेगी  फिर नई सभ्यता खोजेगी अवशेषों में हमारी, तुम्हारी गढ़ी हुयी कहानियाँ किन्ही मंदिरों, मकबरों में पर ओ विनाशकारी तब तुम भी वहाँ स्त्री पुरुष और जाति,धर्म खोजना जब वे स...

शान्तनु

वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया पाट की पटडोरियाँ गाती हुई कभी हंसती, कभी रोती वो उलझी सी औरत तुम्हारी माँ कहा हैं, शान्तनु ! अनायास आज तुम याद आये माँ के साथ साथ तुम्हारा चलना धीरे धीरे वो वही औरत जिसे लोग उर्मि पगली कहते थे तुम उसी उर्मि पगली का प्रेम से हाथ थामे खेलने आते थे ना, शान्तनु ! हम मिट्टी पत्थर से घर बनाते और तुम्हारी माँ वह सब तोड़ देती फिर हँसने लगती, तब गुस्से में हम घर लौट जाते फिर तुम्हारे जाने के बाद मैं वापस आती तो घर बना मिलता था, शान्तनु ! जब तुम स्कुल जाते , उस वक्त माँ सडकों पर लौटते वक्त वह तुम्हारे साथ ही होती थी तब मिड डे मिल, सरकार की निःशुल्क शिक्षा और इन्दिरा आवास भी नही था तुम तो हजार चुनौतियों से लड़ें ना मित्र, शान्तनु ! अब तुम जीत गये हो या हार गये आज मैं सुनना चाहती हूँ तुमसे तुम्हें देखना और जानना चाहती हूँ कि अंत्योदय बच्चे भी बच्चे भी सीमायें तोडकर कैसे कुंदन बन निखर जाते हैं,   शान्तनु ! जाने के वर्षो बाद मैं उसी जगह फिर आयी तो तुम नही मिले, मैने लोगों से पूछा पर लोग निरुत्तर थे...