उम्मीद
उम्मीद पलकों से इक बरौनी गिरी उम्मीदें करीब आ गयी .... भले ही झूठ थी पर टुटी हुयी बरौनी से भी उम्मीद थी ....... क्योंकि सच और झूठ, उम्मीद के बच्चे हैं ... जो उम्रभर पलते हैं झूलते हैं सपनों में उम्मीद कभी उम्रदराज नही होती तब भी नही जब साँसें बोझिल होती है जब तक आखें पथरा न जाऐ .... तब तक उम्मीद, सनेस, पिस्सू सी खाट के पाये से चिपकी रहती है कभी गर्म चाय की सतह में चिपकी होती है वह मैली बनियान के उपर नये कुरते की की गंध में होती है वह रामायण ग्रंथ के आखिरी कुछ पन्नो में छिपाऐ नोटो पर होती है उम्मीद कुड़े के ढेर में मिलने वाली रद्दी, लोहे से होती है बुद्धिजीवी की उम्मीद कागज कलम दवात में और किसान की गोबर, मिट्टी और मौसम से होती है औरत की उम्मीद नाभि के भीतर हलचल करती है और आदमी की उम्मीद 'पाने की अभिलाषा' पर समंदर की चरमता चाहती है.... सच कहूँ उम्मीद पके भात के आखिरी सीते में होती है ... मैने कहा ना,कि उम्मीद उम्रदराज नही होती इसलिए मरती भी नही पर वह संक्रामक होती है उड़ जाती...