उम्मीद
उम्मीद
पलकों से इक बरौनी गिरी
उम्मीदें करीब आ गयी ....
भले ही झूठ थी पर
टुटी हुयी बरौनी से भी उम्मीद थी .......
क्योंकि सच और झूठ, उम्मीद के बच्चे हैं ...
जो उम्रभर पलते हैं
झूलते हैं सपनों में
उम्मीद कभी उम्रदराज नही होती
तब भी नही जब
साँसें बोझिल होती है
जब तक आखें पथरा न जाऐ ....
तब तक उम्मीद, सनेस, पिस्सू सी
खाट के पाये से चिपकी रहती है
कभी गर्म चाय की सतह में चिपकी होती है
वह मैली बनियान के उपर नये कुरते की
की गंध में होती है
वह रामायण ग्रंथ के आखिरी कुछ पन्नो में
छिपाऐ नोटो पर होती है
उम्मीद कुड़े के ढेर में मिलने वाली रद्दी, लोहे से होती है
बुद्धिजीवी की उम्मीद कागज कलम दवात में
और किसान की गोबर, मिट्टी और मौसम से होती है
औरत की उम्मीद नाभि के भीतर हलचल करती है
और आदमी की उम्मीद 'पाने की अभिलाषा' पर
समंदर की चरमता चाहती है....
सच कहूँ उम्मीद पके भात के आखिरी सीते में होती है ...
मैने कहा ना,कि उम्मीद उम्रदराज नही होती
इसलिए मरती भी नही
पर वह संक्रामक होती है
उड़ जाती है
किसी और के पास
चिपक जाती है
रिश्तों की दीवारों पर
जब तक पुरी होती रहती है
जिंदा रहती है
जब नही होती तो लोग कहते हैं
उम्मीद ने दम तोड़ दिया
ऐसा नही है क्योंकि जैसे ही
उम्मीद टुटती है
हर टूटे हिस्से अपने अपने रास्ते बना कर
नई उम्मीद पैदा करते है
सच और झूठ
पैदा करते हैं
उम्मीद भेदभाव रहित उन्हें पालती है
बच्चे, बुड़े
औरत, आदमी
पक्ष विपक्ष
गाँव, घर
देश, देशांतर
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय
विश्व पटल पर उम्मीद खड़ी होती है
उम्मीद,बस उम्मीद है
उसने सालों साल बने रहना है
और दुनिया उम्मीद पर टिकी रहनी है
उम्मीद दुनियाँ की बुनियाद है
जिसपर कभी कभी दीमक लग जाती है ..........
और कभी उम्मीद से अधिक भी हो जाता है
नीलम पांडेय "नील"
Published
अखंड भारत
पत्रिका
पलकों से इक बरौनी गिरी
उम्मीदें करीब आ गयी ....
भले ही झूठ थी पर
टुटी हुयी बरौनी से भी उम्मीद थी .......
क्योंकि सच और झूठ, उम्मीद के बच्चे हैं ...
जो उम्रभर पलते हैं
झूलते हैं सपनों में
उम्मीद कभी उम्रदराज नही होती
तब भी नही जब
साँसें बोझिल होती है
जब तक आखें पथरा न जाऐ ....
तब तक उम्मीद, सनेस, पिस्सू सी
खाट के पाये से चिपकी रहती है
कभी गर्म चाय की सतह में चिपकी होती है
वह मैली बनियान के उपर नये कुरते की
की गंध में होती है
वह रामायण ग्रंथ के आखिरी कुछ पन्नो में
छिपाऐ नोटो पर होती है
उम्मीद कुड़े के ढेर में मिलने वाली रद्दी, लोहे से होती है
बुद्धिजीवी की उम्मीद कागज कलम दवात में
और किसान की गोबर, मिट्टी और मौसम से होती है
औरत की उम्मीद नाभि के भीतर हलचल करती है
और आदमी की उम्मीद 'पाने की अभिलाषा' पर
समंदर की चरमता चाहती है....
सच कहूँ उम्मीद पके भात के आखिरी सीते में होती है ...
मैने कहा ना,कि उम्मीद उम्रदराज नही होती
इसलिए मरती भी नही
पर वह संक्रामक होती है
उड़ जाती है
किसी और के पास
चिपक जाती है
रिश्तों की दीवारों पर
जब तक पुरी होती रहती है
जिंदा रहती है
जब नही होती तो लोग कहते हैं
उम्मीद ने दम तोड़ दिया
ऐसा नही है क्योंकि जैसे ही
उम्मीद टुटती है
हर टूटे हिस्से अपने अपने रास्ते बना कर
नई उम्मीद पैदा करते है
सच और झूठ
पैदा करते हैं
उम्मीद भेदभाव रहित उन्हें पालती है
बच्चे, बुड़े
औरत, आदमी
पक्ष विपक्ष
गाँव, घर
देश, देशांतर
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय
विश्व पटल पर उम्मीद खड़ी होती है
उम्मीद,बस उम्मीद है
उसने सालों साल बने रहना है
और दुनिया उम्मीद पर टिकी रहनी है
उम्मीद दुनियाँ की बुनियाद है
जिसपर कभी कभी दीमक लग जाती है ..........
और कभी उम्मीद से अधिक भी हो जाता है
नीलम पांडेय "नील"
Published
अखंड भारत
पत्रिका
वाह
ReplyDeleteबहुत खूब
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