Posts

उम्मीद

उम्मीद पलकों से इक बरौनी  गिरी उम्मीदें करीब आ गयी .... भले ही झूठ थी पर   टुटी हुयी बरौनी से भी उम्मीद थी ....... क्योंकि सच और झूठ, उम्मीद के बच्चे हैं ... जो उम्रभर पलते हैं झूलते हैं सपनों में   उम्मीद कभी उम्रदराज नही होती तब भी नही जब   साँसें बोझिल होती है जब तक आखें पथरा न जाऐ .... तब तक उम्मीद, सनेस, पिस्सू सी   खाट के पाये से चिपकी रहती है   कभी गर्म चाय की सतह में चिपकी होती है   वह मैली बनियान के उपर नये कुरते की की गंध में होती है वह रामायण ग्रंथ के आखिरी कुछ पन्नो में छिपाऐ नोटो पर होती है उम्मीद कुड़े के ढेर में मिलने वाली रद्दी, लोहे से होती है बुद्धिजीवी की उम्मीद कागज कलम दवात में   और किसान की गोबर, मिट्टी और मौसम से होती है औरत की उम्मीद नाभि के भीतर हलचल करती है और आदमी की उम्मीद 'पाने की अभिलाषा' पर   समंदर की चरमता चाहती है.... सच कहूँ उम्मीद पके भात के आखिरी सीते में होती है ... मैने कहा ना,कि उम्मीद उम्रदराज नही होती   इसलिए मरती भी नही   पर वह संक्रामक होती है   उड़ जाती...

बुलबुले

पानी के कई अनगिनत से बताशे रोज मेरे खेलों में बनते बिगड़ते है आज फिर खुब चमकता सा एक बुलबुला अनायास हवा में गुम होता चला गया । ऐसे ही बेबाक मेरा हसंना और मेरी चमकती आखों में क्षणिक झिलमिलाते असंख्य जुगनु कई दफा रात में बने और दिन में पता न लगा। रोटी में चांद खोजने की कोशिशें नमक की ढेली में हर बार नये स्वाद लेता जिंदा रखता गया मुझमें मेरा सपना चाहे मैं कई बार कुर्ते की बांहे अनायास भिगा गया । मैं नही जानता खुशियों के बँटवारे सबके लिये अलग अलग कैसे हैं किन्तु मेरी खुशियों के मायने कुछ तो जुदा है उन्हे आसान और मुझे पल पल जलजला मिलता गया गाहेबगाहे आती रही जो चुनौतियों की सदायें परवाह नही कौन मुझसे मेरी राहे जुदा करता गया मैं हसंने के बहाने तलाशता सा बेफिक्र भले ही आज भी वही हूँ एक बनता बिगड़ता बुलबला ।। नीलम पांडेय “नील”

दीवारें

दीवारें बहुत लंबी उम्र लेकर आती है इंसान से भी अधिक  पर एक समय के बाद उनमें पसरी नमी,सीलन से बस वे छुने भर से ही भरभरा जाती हैं जाने कब से रोका हैं सैलाब उसने भीतर उठा नही पाती जब वे बोझ खुद का भी अंदर संर्वांग तक भीगते वे तन्हा होने लगती हैं सदियों तक न पाकर अपने आस पास आदमी की सांसे वो दम तोड़ती रहती हैं आज सुनी मैंने भी उनकी घुलती सांसो  और अंदर से दिखती टुटी धुमिल प्रतीकों की  अनगिनत खामोश बातें उनकी कोशिशें खुद को जिंदा रखने की चौखटों की नक्काशी में छुपी वैभव की कहानी कभी कभी सुनायी देती है दीवारों में हंसी ठहाको की वही पुरानी सी ठसक और एक लंबी सी कसक ।।। नीलम नवीन “नील”

शपथ

शपथ है तुमको मेरे दोस्त मेरे जाने के बाद रस्म की मेरी कोई गुजारिश न होगी बस छोटी सी ख्वाहिश मेरे कफन में तिंरगे की होगी ।       न जलाना न दफनाना मुझे       बस बाँट देना जिस्म को जब       जरूरत हो जिसकी जैसी भी       और जो बचे वो गंगा की होगी । शपथ है तुमको मेरे दोस्त परवाह नही कि चील कौवे मछली का निवाला बन जाऊँ बस तराण आये मनको उनके।           न फुल न अगरू न थूप देना         थोड़ी सी मिट्टी मेरे गाँव की          मेरे माथे पर टिका देना और         गौशाला में चाहो तो घुमा देना शपथ है तुमको मेरे दोस्त न हलुवा न पुरी न खीर हो बस भरपेट रोटी, तरकारी हो पास की बस्ती में उस दिन जश्न हो       चाहो तो वीणा,मृदंग, सितार बजाना       वो पुराने रेडियो में एफ एम चलाना     ...

माँ की तरह

अब मैं जागना चाहती हूँ पर ना जाने क्यों ? मेरी असीमित नींद पल पल मेरा पीछा कर रही है जैसे कुछ छुपाना चाहती है मुझसे अब मैं पूरी रात जागकर सुनना चाहती हूँ रात की सिसकियों को और अपनी कृत्रिम रोशनी से उसके अंधेरे को बाटंना चाहती हूँ पर हर बार वह मुझे सुला कर अकेले ही अपने अँधेरे में जूझ रही है बिल्कुल माँ की तरह । नीलम नवीन "नील"

नदी, पहाड़ और औरत

ईजा को देखती हूँ बातें करते गाढ़ गधेरों, नदियों से और कभी कभी पहाड़ों से तो महसूस हुआ यकीनन पहाड़ों में औरतें दो तरह की होती हैं एक नदी और दूसरी पहाड़ सी नदी सी औरत बस बहती है संवेदनाओं के सुरों में कभी चंचल, कभी शान्त कभी मुखर भावों में अनजानी राहों में हिम सी पिघलती हुयी छोड़  आती है अपनी ऊँचाई,अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने मन के अबाध सौन्दर्य से खुद को भुल कर सींचने लगती है आदम और उनकी जड़ों को कभी जब छलछला कर उतर जाती है वह जीवन की तलहटी में तब भी नही छोड़ती वह अपनी आत्मा देह में बसी और खोल देती है अन्त:श जीवन भर सबको नम करते करते जाने कब किस मोड़ पर एकाएक समन्दर को सौंप देती है अपना अस्तित्व भी और खो जाती हैं गंगा ,गोमती, मंदाकिनी, शारदा, भागीरथी जैसे कई नाम जो मां और मायके की शीतल हिमनदी  सी बयारों में कभी मिले थे उसे और दुसरी पहाड़ सी औरत कठोर होकर समेट लेती है अपनी कोमलता छिपा लेती है सारे भाव वह पुरुष  बन जाती है कभी प्रहरी और कभी संबल बन जाती है बस रोना भुल खड़ी रहती है बरसों जीती है कई मंजर पहाड़ से जीवन के जब तक कोई ...

सुबह जैसी शाम

कुछ नही बस .....यूँ ही खाली अक्षांश में सोयी हुयी नियति मात्र कभी रेतीले रेगिस्तान में चमकते पानी का सा भ्रम । जब सुबह और शाम के फर्क धुंधलाने लगते है तब रंगे हुऐ गगन में अलसाया सा सूरज भी अपनी तपिश में जलता अकसर अकेला रह जाता है । धरा की रोशनी होकर भी वह आने वाली शाम को उनींदी आखों में समेट चाँद के अनचाहे स्पर्श के सपने देखता है । ढलती शाम में चांद जैसा बनने की कोशिश किन्तु सूरज फिर भी नही छोड़ पाता अपनी रक्तिमता कितने अलग चांद और सूरज । एक ही आकाश में दो अजनबी जब खुद आकाश गंगा के रास्ते में चलते हैं तब चटक सुबह और इंद्रधनुषी शाम में पुरी कायनाथ को गुलाबी हो आयी आखों से समेटने लगते हैं । सदियों से ये लुकाछिपी किसी से छुपी नही है पर जब नही देख पाती अधूरे मिलन को तब परियां शाम को धरती पर उतरती हैं । वो बंद होते फुलों  में रात होने तक छुप जाती है तब उसी क्षण शाम बेहद रंगीन होती है ,कुछ पल सुरज और चांद इकठ्ठे आसमान में दिखते है आह ! तब थोड़ी सी सुबह जैसी शाम होती है । नीलम नवीन "नील" 10/10/16