दीवारें
दीवारें बहुत लंबी
उम्र लेकर आती है
इंसान से भी अधिक
पर एक समय
के बाद उनमें पसरी
नमी,सीलन से बस
वे छुने भर से ही
भरभरा जाती हैं
जाने कब से रोका हैं
सैलाब उसने भीतर
उठा नही पाती जब
वे बोझ खुद का भी
अंदर संर्वांग तक भीगते
वे तन्हा होने लगती हैं
सदियों तक न पाकर
अपने आस पास
आदमी की सांसे
वो दम तोड़ती रहती हैं
आज सुनी मैंने भी
उनकी घुलती सांसो
और अंदर से दिखती
टुटी धुमिल प्रतीकों की
अनगिनत खामोश बातें
उनकी कोशिशें खुद
को जिंदा रखने की
चौखटों की नक्काशी में
छुपी वैभव की कहानी
कभी कभी सुनायी देती है
दीवारों में हंसी ठहाको की
वही पुरानी सी ठसक
और एक लंबी सी कसक ।।।
नीलम नवीन “नील”
उम्र लेकर आती है
इंसान से भी अधिक
पर एक समय
के बाद उनमें पसरी
नमी,सीलन से बस
वे छुने भर से ही
भरभरा जाती हैं
जाने कब से रोका हैं
सैलाब उसने भीतर
उठा नही पाती जब
वे बोझ खुद का भी
अंदर संर्वांग तक भीगते
वे तन्हा होने लगती हैं
सदियों तक न पाकर
अपने आस पास
आदमी की सांसे
वो दम तोड़ती रहती हैं
आज सुनी मैंने भी
उनकी घुलती सांसो
और अंदर से दिखती
टुटी धुमिल प्रतीकों की
अनगिनत खामोश बातें
उनकी कोशिशें खुद
को जिंदा रखने की
चौखटों की नक्काशी में
छुपी वैभव की कहानी
कभी कभी सुनायी देती है
दीवारों में हंसी ठहाको की
वही पुरानी सी ठसक
और एक लंबी सी कसक ।।।
नीलम नवीन “नील”
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