तनश्वर

तनश्वर

केवल पुरुषेश्वर
या अर्ध नारीश्वर
भेद किधर है
बताओगे जरा
शुक्ष्म जैविक भेद पर
तर्क करना, बांट देना
एक महाशक्ति पुंज को
यूहीं प्रकृति की गति बदल कर
विनाश को चरमता में ले आओगे 
बोलो ! कैसे सह पाओगे
फिर क्यों स्त्री और पुरुष में
उलझ कर
युग्म की गति को
क्षीण कर रहे हो
यह जो एक महाकाव्य है
युगों युगांतर तक
सृष्टि की अंतिम सृष्टि
में उसकी रचना ही न भूल
जाओगे तुम
याद है सदियों रेंग रेंग कर जीव
जब तनश्वर बना
धरती के विस्तार में
स्वयं ही स्वयंभू कभी धरती बना
किन्तु आज समंदर की दिशा
बदल कर वही
फिर से रेंग रेंग कर हिमखण्ड में
ही न बदल जाओगे तुम
या पिघल कर हवा में तब्दील हो जाओगे
तब कहीं सदियों बाद पुनः
रूहानी हवाओं के गर्म विस्तार से
दो स्वरूपों में आदि अनादि शक्ति
मनु और इड़ा जन्म लेंगे
तब कोई रंगरेज फिर धरती
को हरा रंग देगा
और पुरुस्त्री
धरती कई  रंगों में रंग जायेगी
 फिर नई सभ्यता खोजेगी
अवशेषों में हमारी, तुम्हारी
गढ़ी हुयी कहानियाँ
किन्ही मंदिरों, मकबरों में
पर ओ विनाशकारी तब तुम भी
वहाँ स्त्री पुरुष और
जाति,धर्म खोजना
जब वे सब जीवन में प्रेम खोज रहे होंगे ।
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नीलम नवीन "नील"
9/8/17


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