शान्तनु


वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया
पाट की पटडोरियाँ गाती हुई
कभी हंसती, कभी रोती
वो उलझी सी औरत
तुम्हारी माँ कहा हैं, शान्तनु !

अनायास आज तुम याद आये
माँ के साथ साथ तुम्हारा चलना धीरे धीरे
वो वही औरत जिसे लोग उर्मि पगली कहते थे
तुम उसी उर्मि पगली का प्रेम से हाथ थामे
खेलने आते थे ना, शान्तनु !

हम मिट्टी पत्थर से घर बनाते
और तुम्हारी माँ वह सब तोड़ देती
फिर हँसने लगती, तब गुस्से में
हम घर लौट जाते फिर तुम्हारे जाने के बाद
मैं वापस आती तो घर बना मिलता था, शान्तनु !

जब तुम स्कुल जाते, उस वक्त माँ सडकों पर
लौटते वक्त वह तुम्हारे साथ ही होती थी
तब मिड डे मिल, सरकार की निःशुल्क शिक्षा
और इन्दिरा आवास भी नही था
तुम तो हजार चुनौतियों से लड़ें ना मित्र, शान्तनु !

अब तुम जीत गये हो या हार गये
आज मैं सुनना चाहती हूँ तुमसे
तुम्हें देखना और जानना चाहती हूँ
कि अंत्योदय बच्चे भी बच्चे भी सीमायें तोडकर
कैसे कुंदन बन निखर जाते हैं,  शान्तनु !

जाने के वर्षो बाद मैं उसी जगह फिर आयी
तो तुम नही मिले, मैने लोगों से पूछा
पर लोग निरुत्तर थे ।
और होते भी क्यों नही आखिर एक पागली की
फिक्र वेबजह कोई क्यों करता ना, शान्तनु !

तुम बिना बताये क्यों चले गये, उत्तर मत देना
माँ तुम्हें प्रिय थी, शायद लोगो के तंज सह नही पाये
तुम दूर चले गये किन्तु  मैं जानती हूँ
कि तुम टूट सकते हो, बिखर भी सकते हो
पर कभी भी हार नही सकते ना मित्र, शान्तनु !

नीलम नवीन “नील”

देहरादून

Comments

  1. ब्लॉग के लिए शुभकामनाये । अपना और अपनों का मुँह मीठा कर लेना ताकि मधुर शब्दों के रस में डूबे मन के साथ साथ जिह्वा भी मिठास का आनंद ले सके।

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